August 24, 2026
24 aug 16
  • बढ़े दाम:चीनी के रेट में बढ़ोतरी से पड़ा असर

हरियाणा ब्रेकिंग न्यूज :  आगरा की मशहूर मिठाई पेठे की कीमत बढ़ गई है। पहले कमर्शियल गैस सिलेंडर की बढ़ी कीमतों से पेठा कारोबारियों का खर्च बढ़ा और अब चीनी महंगी होने से उन्हें दूसरा झटका लगा है।

चीनी के दाम 20 से 25 रुपए किलो बढ़कर करीब 65 रुपए तक पहुंचने के बाद आगरा के पेठे के दाम भी 20 से 25 रुपए किलो तक बढ़ गए हैं। जो पेठा पहले 140 रुपए किलो बिक रहा था, वह अब करीब 160 से 165 रुपए किलो मिलेगा।

कारोबारियों का कहना है कि पेठा करीब 60% चीनी पर निर्भर है, इसलिए अगर चीनी की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं तो आने वाले दिनों में पेठा और महंगा हो सकता है।

पहले गैस ने बढ़ाई लागत, अब चीनी ने बढ़ाई मुश्किल

पेठा कारोबारी राजेश अग्रवाल का कहना है कि पेठा व्यापारियों की हालत इस वक्त “आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपैया” जैसी हो गई है। उनका कहना है कि पहले कमर्शियल गैस सिलेंडर के दाम बढ़ने से उत्पादन लागत बढ़ी और अब चीनी की कीमतों में तेजी ने कारोबार की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।

पहले ही सिलेंडर की महंगाई से पेठा कारोबारियों को नुकसान उठाना पड़ा था और अब चीनी के दाम बढ़ने से पेठा बनाना और महंगा हो गया है।

कारोबारियों के अनुसार, पहले चीनी करीब 40 से 45 रुपए किलो मिल रही थी, जो अब 65 रुपए किलो तक पहुंच गई है। यानी एक किलो चीनी पर करीब 20 से 25 रुपए का अतिरिक्त खर्च बढ़ गया है। पेठे की लागत का बड़ा हिस्सा चीनी पर निर्भर होने के कारण इसका असर सीधे तैयार पेठे की कीमत पर पड़ा है।

पेठा 60% चीनी पर निर्भर, इसलिए बढ़ाना पड़ा भाव

पेठा व्यापारी सोनू मित्तल का कहना है कि पेठा करीब 60% चीनी पर निर्भर है। चीनी के दाम में 20 से 25 रुपए किलो की बढ़ोतरी का सीधा असर पेठे की कीमत पर पड़ा है। उत्पादन लागत बढ़ने के बाद कारोबारियों को मजबूरी में पेठे के दाम 20 से 25 रुपए किलो तक बढ़ाने पड़े हैं।

उन्होंने कहा कि त्योहारों के समय चीनी की कीमतों में तेजी सिर्फ पेठे के लिए ही नहीं, बल्कि अन्य मिठाइयों के दाम बढ़ने का भी संकेत है। त्योहार नजदीक होने के बावजूद बढ़ी लागत और कम होती बिक्री कारोबारियों की चिंता बढ़ा रही है।

बिक्री पहले ही 30% घटी, त्योहार पर और घटने की आशंका

प्राचीन पेठा प्रतिष्ठान संचालक राजेश अग्रवाल का कहना है कि पिछले कुछ महीनों में पेठे की बिक्री करीब 30% तक कम हो चुकी है। अब रक्षाबंधन और अन्य त्योहार नजदीक हैं, लेकिन बढ़े दामों से बिक्री पर और असर पड़ सकता है। उनका कहना है कि जो ग्राहक पहले त्योहारों या आम दिनों में 2 से 3 किलो पेठा खरीदकर ले जाता था, वह अब एक किलो में ही काम चला सकता है।

आगरा का पेठा पर्यटकों के साथ स्थानीय लोगों की भी पसंद है। ताजमहल घूमने आने वाला पर्यटक अक्सर लौटते समय अपने परिवार और परिचितों के लिए पेठा जरूर खरीदता है। ऐसे में त्योहार और पर्यटन सीजन में बिक्री बढ़ने की उम्मीद रहती है, लेकिन महंगाई के कारण इस बार पेठा कारोबारियों को बिक्री और घटने की चिंता है।

कालाबाजारी रोकने की मांग, प्रशासन से की कार्रवाई की अपील

राजेश अग्रवाल ने चीनी की बढ़ती कीमतों को लेकर जमाखोरी और कालाबाजारी पर रोक लगाने की मांग की है। उनका कहना है कि चीनी के दाम बढ़ने के बाद कुछ लोगों द्वारा जमाखोरी और कालाबाजारी किए जाने से बाजार में कीमतें और बढ़ रही हैं। उन्होंने ऐसे लोगों से भी अपील की कि वे कालाबाजारी न करें।

साथ ही पेठा कारोबारी ने शासन और प्रशासन से चीनी की कालाबाजारी और जमाखोरी पर सख्ती से रोक लगाने की गुजारिश की है। उनका कहना है कि अगर इस पर प्रभावी कार्रवाई होती है तो चीनी के दामों में कुछ गिरावट आ सकती है। इससे पेठा उद्योग की बढ़ती लागत कम होगी और कारोबारियों को मुनाफा मिलने की संभावना बढ़ेगी।

आगरा की पहचान पेठा, पर्यटक लौटते समय जरूर खरीदते हैं

पेठा… नाम सुनते ही मुंह में मिठास घुल जाती है। आगरा आए और पेठा लेकर घर न जाएं, ऐसा बहुत कम होता है। ताजनगरी का पेठा सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि देश और दुनिया भर में अपनी खास पहचान रखता है। विदेश से ताजमहल देखने आने वाले कई पर्यटक भी लौटते समय आगरा का पेठा अपने साथ ले जाते हैं।

आगरा के नूरी दरवाजा इलाके में दशकों से पेठा बनाने का काम हो रहा है। यहां तैयार पेठा अपनी खास बनावट और स्वाद के लिए जाना जाता है। यह कई दिनों तक खराब नहीं होता, इसलिए इसे दूसरे शहरों और विदेशों तक भी आसानी से ले जाया जाता है।

कुम्हड़े से बनता है मशहूर पेठा

पेठा बनाने की प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है। इसके लिए सबसे पहले कच्चे कुम्हड़े को काटा जाता है और उसके अंदर से गूदा निकाला जाता है। इसके बाद इसे पेठे के आकार में टुकड़ों में काटा जाता है। इन टुकड़ों को नुकीली कीलों वाली मशीन से गोदा जाता है, ताकि बाद में चाशनी की मिठास अंदर तक पहुंच सके।

इसके बाद टुकड़ों को चूने के पानी में कई बार अच्छी तरह धोया जाता है और गर्म पानी में उबाला जाता है। फिर पेठे को चाशनी में पकाया जाता है। अलग-अलग स्वाद के लिए इसमें फ्लेवर मिलाए जाते हैं और सुखाने के बाद इसे बिक्री के लिए तैयार किया जाता है। यही वजह है कि पेठा लंबे समय तक खराब नहीं होता।

 

आगरा में बनते हैं 56 तरह के पेठे

समय के साथ आगरा के पेठे की वैरायटी बढ़ी है। यहां अब करीब 56 तरह का पेठा बनाया जाता है। इनमें सूखे पेठे और केसर पेठे की सबसे ज्यादा मांग रहती है। इसके अलावा पान पेठा, गुलाब लड्डू पेठा, सैंडविच पेठा, मेवावाटी, केसर चेरी, कोकोनट पेठा, पिस्ता पसंद और लाल पेठा भी लोगों की पसंद बना हुआ है।

डायबिटीज के मरीजों के लिए शुगर फ्री पेठा भी तैयार किया जाता है। पान पेठे में गुलकंद का स्वाद मिलता है, जबकि गुलाब लड्डू पेठे में गुलाब की खुशबू का अनुभव होता है।

महाभारत काल से जुड़ा बताया जाता है पेठे का इतिहास

पेठा कारोबारी राजेश अग्रवाल बताते हैं कि पेठे का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा बताया जाता है। पहले इसका इस्तेमाल औषधि के रूप में होता था। बाद में इसे खाने के लिए प्रयोग किया जाने लगा। मुगलकाल में पेठे को मिठाई के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा और धीरे-धीरे यह आगरा की खास पहचान बन गया।

कारोबारी बताते हैं कि पेठे का अस्तित्व ताजमहल से पहले का माना जाता है। हालांकि, पेठे के इतिहास को लेकर अलग-अलग मान्यताएं प्रचलित हैं।

देशभर में मांग, लेकिन महंगाई से कारोबार पर असर

पेठा आगरा की पहचान बन चुका है और इसकी मांग स्थानीय बाजार के साथ दूसरे शहरों में भी रहती है। व्रत, पूजा और त्योहारों में इसकी बिक्री बढ़ जाती है। पर्यटक इसे आगरा की सबसे खास चीजों में शामिल मानते हैं। पहले पेठा करीब 140 से 400 रुपए किलो की रेंज में बिकता था।

अब चीनी के दाम बढ़ने के बाद कम कीमत वाला पेठा 160 से 165 रुपए किलो तक पहुंच गया है। कारोबारियों के मुताबिक, पिछले कुछ महीनों में बिक्री करीब 30% कम हो चुकी है। अगर चीनी की कीमतें और बढ़ीं तो पेठे के दामों में भी फिर बढ़ोतरी हो सकती है। ऐसे में त्योहारों के दौरान भी ग्राहक पहले की तुलना में कम मात्रा में पेठा खरीद सकते हैं और कारोबारियों की बिक्री में और गिरावट आ सकती है।