- एक्सपोर्टर्स बोले- वैकल्पिक रास्ता जरूरी
हरियाणा ब्रेकिंग न्यूज : होर्मुज संकट ने भारत के बासमती चावल कारोबार की चिंता बढ़ा दी है। युद्ध के चलते होर्मुज जलडमरूमध्य का रास्ता बार-बार बाधित होने से भारत से गल्फ देशों को होने वाला चावल निर्यात प्रभावित हो रहा है। स्थिति यह है कि करीब एक से डेढ़ लाख मीट्रिक टन चावल बंदरगाहों और समुद्र के बीच अटका हुआ है।
दूसरी तरफ ईरान, इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और यमन जैसे देशों में भी भारतीय चावल की आपूर्ति प्रभावित होने लगी है। ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (एआईआरईए) लगातार केंद्र सरकार के संपर्क में है।
निर्यातकों को भरोसा दिया गया है कि होर्मुज संकट का समाधान निकालने के साथ वैकल्पिक रास्ते तलाशे जाएंगे। अप्रैल से जून 2026 के आंकड़े भी कारोबार पर पड़े असर की तस्वीर दिखा रहे हैं। अप्रैल में निर्यात की मात्रा में बड़ी गिरावट आई, जबकि मई और जून में कीमतों में बढ़ोतरी से कारोबार का मूल्य बढ़ा।
अब सबसे बड़ी चिंता आने वाले 2 महीनों की है, जब किसान नई बासमती फसल मंडियों में लेकर आएंगे। निर्यातकों के पास फंड की कमी रही तो धान खरीद प्रभावित हो सकती है। एआईआरईए ने सरकार से मांग की है कि कम से कम एक साल तक ब्याज में राहत दी जाए।
अप्रैल से जून तक निर्यात में दिखा उतार-चढ़ाव
एआईआरईए कार्यालय से मिले आंकड़ों के अनुसार साल 2025 और साल 2026 के अप्रैल, मई और जून के आंकड़ों में निर्यात की मात्रा और कीमत में बड़ा अंतर देखने को मिला है। अप्रैल 2025 में 6 लाख 47 हजार 71 मीट्रिक टन बासमती चावल का निर्यात हुआ था। इसकी कीमत 4716.65 करोड़ रुपए थी।
वहीं अप्रैल 2026 में निर्यात घटकर 4.74 लाख मीट्रिक टन रह गया। यानी 1.73 लाख मीट्रिक टन की कमी आई। इसकी कीमत 4078.87 करोड़ रुपए रही, जो अप्रैल 2025 की तुलना में 637.78 करोड़ रुपए कम थी।
मई 2025 में 5 लाख 78 हजार 938 मीट्रिक टन चावल का निर्यात हुआ था। इसकी कीमत 4252.19 करोड़ रुपए थी। मई 2026 में मात्रा घटकर 5 लाख 38 हजार 722 मीट्रिक टन रह गई। यानी 40 हजार 216 मीट्रिक टन कम चावल भेजा गया। इसके बावजूद चावल की कीमत बढ़ने से निर्यात का मूल्य 4774.87 करोड़ रुपए रहा। इस तरह कम मात्रा में निर्यात होने के बावजूद 522.68 करोड़ रुपए का अधिक कारोबार हुआ।
जून 2025 में 5 लाख 6 हजार 247 मीट्रिक टन चावल का निर्यात हुआ था, जिसकी कीमत 3814.05 करोड़ रुपए थी। जून 2026 में निर्यात बढ़कर 5 लाख 25 हजार 678 मीट्रिक टन हो गया। इसकी कीमत 4813.13 करोड़ रुपए रही। इस तरह जून में मात्रा के साथ निर्यात मूल्य में भी बढ़ोतरी हुई।
65 लाख टन का रिकॉर्ड, 70 लाख टन का लक्ष्य
एआईआरईए से जुड़े प्रधान ने बताया कि भारत दुनिया में बासमती चावल का सबसे बड़ा निर्यातक है। अप्रैल 2025 से मार्च 2026 तक भारत ने 65 लाख मीट्रिक टन बासमती चावल का निर्यात किया था। यह देश का अब तक का सबसे ज्यादा निर्यात था। रिकॉर्ड निर्यात का फायदा किसानों को भी मिला और उन्हें बासमती के अच्छे दाम मिले।
उन्होंने बताया कि फरवरी में गल्फ क्षेत्र में युद्ध की स्थिति बनने के बाद मार्च में निर्यात प्रभावित हुआ। इसके बावजूद भारत ने 65 लाख टन का आंकड़ा पार कर लिया। अगर होर्मुज संकट पैदा नहीं होता तो इस बार निर्यात करीब 67 से 68 लाख टन तक पहुंच सकता था।
अब इस सीजन में एक्सपोर्टर्स ने करीब 70 लाख टन चावल निर्यात करने का लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य में गल्फ देशों की बड़ी हिस्सेदारी है। भारत के कुल बासमती निर्यात का करीब 70 से 80 प्रतिशत हिस्सा गल्फ देशों में जाता है।
ईरान, इराक और सऊदी अरब को करीब एक-एक मिलियन टन चावल भेजा जाता है। इसके अलावा संयुक्त अरब अमीरात और यमन को भी बड़ी मात्रा में चावल का निर्यात होता है। फिलहाल होर्मुज संकट के कारण इन देशों के साथ व्यापार प्रभावित है।
समुद्र में और बंदरगाहों पर माल अटका
एआईआरईए के अध्यक्ष और बोर्ड सदस्य सतीश गोयल ने बताया कि युद्ध की स्थिति लगातार बनी हुई है और निर्यात रुक-रुककर चल रहा है। पिछले 3 महीने के आंकड़ों में भी इसी वजह से काफी उतार-चढ़ाव दिखाई दिया है। जुलाई में दोबारा युद्ध की स्थिति बनने के बाद करीब एक से डेढ़ लाख टन चावल बंदरगाहों और समुद्र के बीच अटक गया।
उन्होंने कहा कि भारत सरकार पूरे मामले पर लगातार नजर रख रही है। फरवरी में जब युद्ध की स्थिति बनी थी, तब एआईआरईए ने सरकार से बातचीत की थी। इसके बाद कांडला बंदरगाह सहित अन्य स्थानों पर फंसे माल पर लगने वाले पूरे भंडारण शुल्क को माफ किया गया था। रास्ते में फंसे माल को लेकर भी सरकार की ओर से राहत दी गई। सतीश गोयल ने इसके लिए सरकार का आभार जताया।
सरकार वैकल्पिक रास्ते और शिपिंग व्यवस्था पर कर रही काम
तीश गोयल के अनुसार होर्मुज संकट का असर निर्यात पर कम से कम हो, इसके लिए केंद्र सरकार वैकल्पिक रास्ते की तलाश कर रही है। इसका उद्देश्य गल्फ देशों में चावल की आपूर्ति को बनाए रखना है। बोर्ड बैठक में एक्सपोर्टर्स ने भी सरकार के सामने अपनी समस्याएं और सुझाव रखे।
बैठक में विदेशी शिपिंग कंपनियों पर निर्भरता का मुद्दा भी उठाया गया। एक्सपोर्टर्स ने बताया कि शिपिंग लाइन की समस्या के कारण भी माल भेजने में दिक्कत आ रही है। सरकार ने भरोसा दिलाया है कि शिपिंग के लिए भी वैकल्पिक व्यवस्था तैयार करने पर काम किया जा रहा है, ताकि भारतीय एक्सपोर्टर्स को विदेशी शिपिंग कंपनियों पर पूरी तरह निर्भर न रहना पड़े।
फंड की कमी से किसानों से खरीद पर भी असर का डर
सतीश गोयल ने बताया कि मौजूदा संकट में एक्सपोर्टर्स को ब्याज का भारी नुकसान हो रहा है और भुगतान की कमी लगातार बढ़ रही है। हालांकि स्थिति को देखते हुए सरकार ने एक्सपोर्टर्स की सीमा 20 प्रतिशत तक बढ़ा दी है, ताकि वे मुश्किल परिस्थितियों में भी कारोबार चला सकें।
इसके बावजूद भुगतान की कमी के कारण आने वाले समय में किसानों से चावल खरीदने में परेशानी हो सकती है। एआईआरईए ने सरकार से मांग की है कि कम से कम एक साल तक ब्याज में राहत दी जाए, ताकि युद्ध और होर्मुज संकट के कारण एक्सपोर्टर्स पर पड़ रहे अतिरिक्त आर्थिक बोझ को कम किया जा सके।
अध्यक्ष ने बताया कि आने वाले 2 महीनों में किसान अपनी बासमती की फसल मंडियों में लेकर पहुंचने लगेंगे। यदि एक्सपोर्टर्स के पास पर्याप्त फंड नहीं रहा तो मंडियों से किसानों की फसल खरीदने में भी परेशानी आएगी। दूसरी ओर अगर होर्मुज रास्ता नहीं खुला तो खरीदा हुआ चावल विदेश भेजना भी चुनौती बन जाएगा। इससे निर्यात के साथ-साथ किसानों पर भी सीधा असर पड़ सकता है।
गल्फ देशों में चावल का सीमित स्टॉक, भारत पर निर्भरता
एआईआरईए के पदाधिकारियों के अनुसार गल्फ देशों के पास लंबे समय तक अपनी जनता की जरूरत पूरी करने जितना चावल का स्टॉक नहीं रहता। इन देशों में चावल मुख्य भोजन में शामिल है और लोग दिन में 3 बार तक इसका इस्तेमाल करते हैं। इसलिए वहां लगातार चावल की आपूर्ति बनाए रखना जरूरी है। गल्फ देशों में भारत के बासमती चावल की मांग लगातार बनी हुई है।
मौजूदा हालात में विदेशों से भारत के एक्सपोर्टर्स के पास चावल की मांग आ रही है, लेकिन होर्मुज के रास्ते में बाधा होने के कारण माल भेजना संभव नहीं हो पा रहा है। बासमती चावल की आपूर्ति में भारत की सबसे बड़ी भूमिका है।
पाकिस्तान के पास भी कुछ मात्रा में बासमती चावल है, लेकिन उसका निर्यात भारत की तुलना में केवल करीब 10 से 15 प्रतिशत ही है। ऐसे में गल्फ देशों की जरूरत पूरी करने के लिए भारत की आपूर्ति बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
जुलाई का आंकड़ा अभी एआईआरईए कार्यालय नहीं पहुंचा
एआईआरईए के मुताबिक जुलाई 2026 का पूरा निर्यात आंकड़ा अभी कार्यालय में नहीं पहुंचा है। इसलिए जुलाई में निर्यात पर होर्मुज संकट का कितना असर पड़ा, इसकी अंतिम तस्वीर बाद में साफ होगी। हालांकि जमीनी स्थिति यह है कि युद्ध के कारण होर्मुज का रास्ता कभी खुला और कभी बंद हुआ। कभी माल बंदरगाहों पर रुका रहा तो कभी समुद्र के बीच फंस गया।
सतीश गोयल ने बताया कि सरकार विदेशों की सरकारों से लगातार बातचीत कर रही है, ताकि होर्मुज के रास्ते को खोलने का कोई समाधान निकाला जा सके। भारत सरकार ने एआईआरईए को आश्वस्त किया है कि यदि युद्ध की स्थिति इसी तरह बनी रहती है और होर्मुज नहीं खुलता तो निर्यात के लिए वैकल्पिक रास्ता या दूसरा विकल्प तलाशा जाएगा।
संकट का असर किसान से मजदूर तक
होर्मुज संकट केवल एक्सपोर्टर्स तक सीमित नहीं है। इसका असर व्यापारी, किसान, मजदूर, मिल संचालक, परिवहन और चावल कारोबार से जुड़े हर व्यक्ति पर पड़ सकता है। यदि निर्यात लंबे समय तक प्रभावित रहा तो एक्सपोर्टर्स की खरीद क्षमता घटेगी, जिससे आने वाली बासमती फसल की खरीद पर भी असर पड़ सकता है।
एआईआरईए को उम्मीद है कि होर्मुज संकट जल्द खत्म होगा और भारत से गल्फ देशों के लिए बासमती चावल की आपूर्ति सामान्य हो सकेगी। फिलहाल सरकार वैकल्पिक रास्तों पर काम कर रही है, जबकि एक्सपोर्टर्स ब्याज में राहत और आर्थिक सहायता की मांग कर रहे हैं। आने वाले 2 महीने बासमती कारोबार के लिए महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं, क्योंकि इसी दौरान नई फसल मंडियों में पहुंचने लगेगी और एक्सपोर्टर्स को बड़े स्तर पर खरीद करनी होगी।