October 30, 2026
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  • गिनीज बुक में एंट्री का सपना

हरियाणा ब्रेकिंग न्यूज :  जींद के गौतम सत्यराज ने 41 फीट लंबी और 30 फीट सांझी बनाई है। जिसे दो ट्रॉली गाय का गोबर व 8 ट्रॉली काली मिट्‌टी से तैयार की है। इसमें बनाने में करीब 15 दिन और 70 हजार रुपए खर्च हुए है। इसे बनाने में कॉलेज व यूनिवर्सिटी स्टूडेंट के साथ परिवार ने भी मदद ली गई है।

सत्यराज 2014 से सांझी का प्रदर्शन कर चुके हैं। इससे पहले 21 व 31 फीट की सांझी बनाकर इंडिया बुक में अपना नाम दर्ज करवा चुके हैं। अब उनका सपना हरियाणा की इस प्राचीन संस्कृति को बचाने के साथ गिनीज, लिमका व वर्ल्ड में अपना नाम दर्ज करवाना है।

प्रदेश के हर कोने में प्रदर्शनी

गौतम सत्यजीत ने बताया कि वह 2014 से सांझी बना रहा है। प्रदेश के हर जिला के कॉलेज व यूनिनर्सिटी में सांझी कला का प्रदर्शन कर चुका हूं। अभी केवल महेंद्रगढ़ और चंडीगढ़ में ऐसा करना का मौका नहीं मिला है। 2021 में 21 और 2023 में 31 फीट लंबी सांझी बनाई थी। जिससे इंडिया बुक में नाम दर्ज करवाने का मौका मिला। इस बार 41 फीट लंबी और 30 फीट चौड़ी सांझी बनाई है। सीआरएसयू में एमए फाइन आर्ट के छात्र गौतम अब मैं वर्ल्ड और गिनिज बुक में एंट्री के लिए दावेदारी करूंगा।

हरियाणा में खास महत्व

हरियाणा में सांझी का मां दुर्गा- पार्वती का रूप माना जाता है। मान्यता है कि नवरात्रों में सांझी की पूजा से घर में सुख- शांति और समृद्धि की प्रतीक होती है। मां पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए वर्त रखे थे।

जिस कारण कवारी लड़कियां सुंदर एवं योग्य पति पाने के लिए सांझी के व्रत भी रखती हैं। नरवरात्रों में गांवों में घरों की दीवारों पर या आंगन में सांझी बनाई जाती थी। विशेष पूजा के बाद विजयदशमी (दशहरें) के दिन सांझी का तालाब व नदियों में बहाया जाता है।

भाईचारे का प्रतीक

गांवों में सांझी को भाईचारें का प्रतीक भी माना जाता था। गांव की लड़कियां एकत्रित होकर सांझी के लोकगीत गाती थी। फिर समूह में जाकर उन्हें जल में प्रवाहित करती थी। अब समय के साथ गांवों में भी प्रथा खत्म होती जा रही है। हालांकि विवाह शादियों और विशेष मौकों विशेषकर शहरों में विवाह शादियों और विशेष मौकों पर घरों को सजाने के लिए भी सांझी बनाई जाती हैं।

नानी से मिली प्ररेणा

गांव ढिगाणा निवासी सत्यजीत ने बताया कि ढाई साल की उम्र में मां की मौत हो गई। जींद में नानी पातू देवी के पास आ गया। बपचन से नानी को सांझी बनाते देखा, उन्हीं से इसकी प्ररेणा मिली। परिवार में पिता सत्यवान व भाई संजीव है। भाभी कमला व उनके बच्चे विश्वास, विशाल और लक्ष्मी इसमें मेरा सहयोग करते हैं। मेरा लक्ष्य विलुप्त होती जा रही हरियाणा की इस प्राचीन कला को विश्व स्तर तक पहुंचना है।

बचाना अब बड़ी चुनौती

गौतम सत्यजीत ने कहा कि सांझी हरियाणवीं संस्कृति की विशेष पहचान है। आधुनिकता व भागदौड़ की चकाचौंध में अब इसे बचाना बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। परंपराओं के अनुसार सांझी गाय के गोबर से बनती हँ। इसके सांस्कृतिक व धार्मिक महत्व से अनजान आज की युवा पीढ़ी इससे दूर भाग रही है।