March 13, 2026
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  • पानीपत के मैरिज पैलेस में चूल्हा जलना शुरू
  • मुरथल के ढाबों ने इंडक्शन चूल्हे मंगवाए

हरियाणा : ब्रेकिंग न्यूज : गैस सिलेंडर की मारामारी को लेकर हरियाणा के कई जिलों में शुक्रवार सुबह से ही लंबी लाइने लगी हैं। भिवानी, गुरुग्राम, रोहतक, रेवाड़ी जैसे जिलों में महिलाएं खुद लाइन में लगकर सिलेंडर लेने आई हैं।

भिवानी की रहने वाली महिला पिंकी का कहना है कि बुक कराने के बाद सिलेंडर घर नहीं पहुंच रहे हैं। बीमार परिजनों को घर छोड़कर सिलेंडर लेने के लिए आई हैं। उधर, रेवाड़ी के रहने वाले राजवीर का कहना है कि दो दिन से लाइन में लगे हैं, लेकिन कोई हल नहीं रहा।

इसके साथ ही शादी के सीजन में गैस की किल्लत पानीपत, सोनीपत और गुरुग्राम जैसे जिलों के कैटरर्स के लिए मुसीबत बन गई है। पानीपत में बैंकेट हॉल और मैरिज पैलेस में हलवाई लकड़ी और कोयला जलाकर खाना बना रहे हैं।

वहीं, मुरथल के नामी ढाबों में इंडक्शन चूल्हे मंगवाए जा रहे हैं। कई ढाबों में चूल्हे पर खाना बनना शुरू हो गया है। दूसरी ओर, हरियाणा को केंद्र सरकार से 8.76 लाख लीटर कैरोसीन ऑयल मिला है।

पानीपत के मैरिज पैलेस का हाल

पानीपत की शादियों में लकड़ी-कोयला बना सहारा: पानीपत शहर और आसपास के इलाकों में करीब 50 से अधिक बड़े बैंकेट हॉल और मैरिज पैलेस हैं, जहां हर दिन शादियों और अन्य सामाजिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है। इन आयोजनों में खाना बनाने के लिए बड़े पैमाने पर कॉमर्शियल एलपीजी सिलेंडरों का उपयोग किया जाता है। लेकिन पिछले कुछ दिनों से कॉमर्शियल सप्लाई पूरी तरह ठप होने के कारण, शहर के बैंकेट हॉल में अब सिलेंडरों की जगह लकड़ी और कोयला जलाकर खाना बनाया जा रहा है।

कॉमर्शियल सिलेंडर न मिलने से घंटों काम कर रहे

पानीपत के प्रसिद्ध हलवाई बंटू ने बताया कि एक औसत शादी, जिसमें करीब 500 मेहमानों का खाना बनता है, वहां कम से कम 15 से 20 कॉमर्शियल सिलेंडरों की जरूरत पड़ती है। गुरुवार को हमारे पास एक बड़ा ऑर्डर था, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद हमें केवल 6 सिलेंडर ही मिल पाए। ऐसे में हमारे पास काम रोकने का विकल्प नहीं था। हमने तुरंत 14 सिलेंडरों की कमी को पूरा करने के लिए लकड़ियों का इंतजाम किया। लेकिन, जो खाना हम गैस भट्ठियों पर महज 4 घंटे के भीतर तैयार कर लेते थे, उसे लकड़ी की आग पर पकाने में सुबह से लेकर रात हो गई। आग को बार-बार नियंत्रित करना पड़ता है और धुआं आंखों और फेफड़ों को नुकसान पहुंचाता है।

मुरथल के ढाबों का हाल…

छोटे ढाबा संचालक सबसे ज्यादा परेशान

मुरथल ढाबा एसोसिएशन के प्रतिनिधि मंजीत सिंह ने बताया कि कॉमर्शियल गैस सिलेंडर की कमी का सबसे ज्यादा असर छोटे ढाबा संचालकों पर पड़ रहा है। बड़े ढाबों के पास कुछ वैकल्पिक साधन मौजूद हैं, लेकिन छोटे ढाबों के लिए गैस की कमी बड़ी समस्या बन गई है। इसी कारण कई ढाबा संचालक अब लकड़ी और कोयले की भट्ठियों पर शिफ्ट हो गए हैं, जबकि कुछ ने इंडक्शन चूल्हों का भी सहारा लेना शुरू कर दिया है।

रेशम ढाबा ने 70% तक घटाया गैस का उपयोग

रेशम ढाबा के मैनेजर मंगत राम के अनुसार गैस की समस्या के चलते उनके ढाबे पर गैस का उपयोग करीब 70 प्रतिशत तक कम कर दिया गया है। फिलहाल गैस का इस्तेमाल केवल 30 प्रतिशत कामों में ही किया जा रहा है, जिसमें मुख्य रूप से तवे की रोटी और पराठे बनाना शामिल है। बाकी अधिकांश खाना अब लकड़ी और कोयले की भट्ठियों पर तैयार किया जा रहा है।
पहले गैस पर बनते थे कई ग्रेवी आइटम: मुरथल के ढाबों में बेस किचन के लगभग 10 से 12 आइटम पहले गैस पर ही तैयार किए जाते थे। इनमें रेड और व्हाइट ग्रेवी, चॉक मसाला, कढ़ाई पनीर, बटर मसाला, मिक्स वेज, येलो दाल और दाल मखनी जैसे लोकप्रिय व्यंजन शामिल हैं। इन सभी व्यंजनों को तैयार करने में गैस का काफी अधिक उपयोग होता था, लेकिन अब गैस की कमी के कारण इन्हें भी लकड़ी और कोयले की भट्ठियों पर बनाया जा रहा है।

ढाबों में लगाई जा रही हैं अतिरिक्त भट्ठियां

मैनेजर मंगत राम ने बताया कि उन्होंने अपने ढाबे पर पांच अलग-अलग भट्ठियां लगा दी हैं, ताकि काम सुचारू रूप से चलता रहे। हालांकि एक भट्ठी को पूरी तरह से चालू होने में करीब 30 से 40 मिनट का समय लगता है। इसके अलावा गैस की तुलना में भट्ठी पर खाना तैयार करने में लगभग 15 मिनट अधिक समय लग रहा है।

मेन्यू और कीमतों में अभी कोई बदलाव नहीं

गैस संकट के बावजूद ढाबा संचालकों ने अभी तक मेन्यू या कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया है। ढाबों पर ग्राहकों की मांग के अनुसार सभी आइटम पहले की तरह तैयार किए जा रहे हैं। संचालकों का कहना है कि फिलहाल उनका प्रयास यही है कि ग्राहकों को किसी प्रकार की असुविधा न हो और सेवा पहले की तरह जारी रहे।

इंडक्शन चूल्हों का सहारा, लेकिन महंगी पड़ रही बिजली:

मुरथल के कई ढाबों ने इंडक्शन चूल्हे भी मंगवाकर रख लिए हैं ताकि जरूरत पड़ने पर उनका इस्तेमाल किया जा सके। झिलमिल ढाबा के संचालक और ढाबा संगठन के प्रधान मंजीत सिंह का कहना है कि उन्होंने भी अपने स्टाफ को इंडक्शन चूल्हे मंगवाने के निर्देश दिए हैं। हालांकि कॉमर्शियल बिजली दरें काफी ज्यादा होने के कारण इंडक्शन चूल्हों का अधिक उपयोग करना भी उनके लिए महंगा साबित हो सकता है।